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अहिरवार गौत्र एवं प्रमुख सरनेम (उपनाम)

  अहिरवार गौत्र नोनिवाल , 2 . पचवारिया , परारिया , पुंवारिया , पंवार , पाटिदया , पड़ियार , रमण्डवार , रेसवाल , पठारिया , पथौरिया , तिलथिया , राताजिया, राईकवार, रैकवार, रानीवाल, राठौर, शक्करवार, साम्भरिया, सिसोदिया, भियाणिया, भकण्ड, बिल्लोरिया, बेतवाल, भरकणिया, बराकला, बाजर, बामनिया, बागडी, बघेल, बरगण्डा, बंजारा, बरतुनिया, चरावंडिया, चन्दवाडा, चन्दवाडे, डरबोलिया, डबरोलिया, डोरिया, डबकवाल, आकोदिया, अटावदिया, बुआ, बडोदिया, बेतेडा, बेंडवाल, दिवाणिया, दसलाखिया, दिहाजो, धादु, धामणिया, धरावडिया, गांगीया, गंगवाल, गमडालू, गमलाडू, गोठवाल, गोगडिया, गढवाल, गोहरा, हनोतिया, जुनवाल, जौनवाल, जिनिवाल, जाजोरिया, जारवाल, जारेवाल, जालोनिया, जाटवा, झांटल, झांवर, जोकचन्द, कांकरवाल, खोलवार, खोरवाल, कुंवार, कुंवाल, कुन्हारा, कुन्हारे, खापरिया, कोयला, खोदा, करेला, काटिया, कावा, केकर, लोदवार, लोदवाल, लोडेतिया, ललावत, माली, मालवीय, मरमट, मिमरोट, मेहर, मेहरा, मेर, मडावरिया, नगवाडा, नागौर, नगवाडे, सरगंडा, टटवाडीया, वाडीया, टांटावत, टाटू, टिकेकर, तलावलिया, तलैय्या, तिहाणिया, टुकडीया, तीहरा, उजवाल, उज्जवाल, ...

वर्ण व्यवस्था

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  वर्ण व्यवस्था आज भारत विभिन्‍न जातियों एवं संस्‍कृतियों की संगम स्‍थली है । हजारों वर्षों के उतार - चढ़ाव से नए - नए विचारों तथा जीवन - पद्धतियों का प्रभाव यहाँ के निवासियों पर पड़ा है । लेकिन आदमी - आदमी के बीच भेदभाव की जो परम्‍परा इस देश के ज्ञात इतिहास के प्रारंभ से अब तक देखने को मिलती है , वह अविचल है , स्थिर है। आर्य बाहर से आए और उन्‍होंने यहाँ के मूलनिवासियों को हराकर अपने आचार - व िचारों को उन पर थोप दिया , उनकी उन्‍नतशील सभ्‍यता और प्रकृतिवादी संस्‍कृति को नष्‍ट - भ्रष्‍ट करके एक तरह से उन्‍हें गुलामों की स्थितियों में ला दिया । फिर वर्ण - व्‍यवस्‍था को शास्‍त्र - सम्‍मत रूप देकर सबसे नीचे की श्रेणी शुद्र बनाकर उसमें रख दिया , जिन्‍हें केवल ऊपर के तीनों वर्णों ( ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य ) की सेवा का अधिकार दिया गया। भारत में जीवन - निर्वाह के बेहतर साधनों की तलाश में आर्य यहाँ आए थे , फिर धीरे - धीरे साम - दण्‍ड - भेद की नीति से मालिक बन बैठे ओर समस्त मानव जाति को कार्य की दृष्टि से चार वर्णों में विभाजित कर दिया । यह विभाजन जाति विभेद के आधार पर नह...