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सामाजिक संगठनों पर नौकरशाहो का कब्जा

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  सुनील कुमार बामने आज देश के दलित-आदिवासी संगठनो पर नजर डाले तो , आज देखेगें की इन संगठनों का महत्व नही के बराबर है। वे कौनसे कारण है कि यह संगठन ना तो , समाज को संगठित करने में सफल हुए , ना ही इनके अधिकारों की सुरक्षा देने में।          आप इन संगठनो पर नजर डाले तो एक बात बहुत स्पष्ट नजर आती है कि इन सभी संगठनो की लीडरशिप पर ब्योरोक्रेट/नौकरशाहों का कब्जा हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि ये लोग इन संस्थाओं पर कब्जा भी तब करने आते है , जब सरकार इन्हें घर भेज देती है अर्थात् रिटायर्ड कर देती हैं।          मेरी समझ में यह नही आता है कि आखिर यह लोग उम्र के अन्तिम पड़ाव में ही इन संस्थाओं का नेतृत्व करने क्यों आ जाते है , जबकि यह बहुत अच्छी तरह जानते है कि उम्र के अन्तिम पड़ाव में , यह समाज को नेतृत्व नही दे सकते , ना ही उम्र व परिस्थितियाॅ इसकी अनुमति देती है क्योकि जिसे सरकार ने रिटायर्ड कर , घर भेज दिया हो। जो सरकारे , दुनिया के बड़े-बड़े राजतंत्र को चलाती हो , उन्हें नही लगता है कि उम्र के अन्तिम पड़ाव में , इ...

समाज को ठगने के प्रयास में नेता

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सुनील कुमार बामने एक बार फिर वह मौसम आ गया है । मैं बात सर्दी के मौसम की नही , चुनावी मौसम की कर रहा हूँ । राजस्थान सरकार भी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अपनी नीतियॉ जनता के लिए बना रही है । बेरोजगारो को नोकरी दी जा रही है , नोकरी वाले को पदोन्नती , सरकार कि लाखों नोकरीयॉ अदालतों , लालफिताशाही के चक्कर मे अटकी पड़ी है । पदोन्नति किसी को मिल गई है , किसी की रोक दी गई है , किसी की होने वाली है । लग ऐसा रहा है कि , सरकार भी दिवाली मना रही है , ऐसा दिखाया जा रहा है , लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि हजारों अध्यापक 55 प्रतिशत टेट के अंक और अन्य कानूनी पचड़े मे फंसे पड़े है । सरकारी कर्मचारियों को भी दिया , कम जा रहा है और दिखाया , ज्यादा जा रहा है , यह तो बात थी सरकार की ।        अब बात करते हैं अपने मूल बिन्दु की , जिस पर हम आपको कुछ वास्तविक जानकारी देने चाहेगे और उन लोगों को आयना बताना चाहेगे , जो समाज को ठगने के प्रयास मे नेता बने बैठे है , और कुछ नेता बनने के प्रयास मे है ।        वास्तविकता पर नजर डाले तो सामाजिक संस्थाऐं , समा...

बुद्धीजीवी समाज का विकास नही चाहता

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सुनील कुमार बामने आप कहेगे की यह क्या कह रहें हैं , मैं ठीक कह रहा हूँ कि , आज जो समाज पिछड़ा हुआ है , उसके लिए कौन जिम्‍मेदार है और आखिर क्या कारण है ?, जो समाज का विकास जितना होना चाहिये , उतना नही हो पाया है , इसके लिए किसे जिम्‍मेदार ठहराये ?        इसे समझने के लिये घर से शुरूआत करनी होगी , क्योकि घर से परिवार और परिवार से समाज और समाज से देश बनता है । आज यदि कोई घर पिछड़ा रह जाता है या किसी घर-परिवार मे कोई विवाद उत्पन्न हो जाता है और बिखराव होता है तो , इसके लिए किसे जिम्‍मेदार ठहराये ? क्या किसी घर-परिवार के बिखराव के लिये सबसे बड़ा- बुजुर्ग व्यक्ति जिम्‍मेदार है या घर का सबसे बुद्विमान व्यक्ति जिम्‍मेदार है ?        किसी भी विवाद या समस्या के समाधान की जिम्‍मेदारी उस व्यक्ति की होती है जो समस्या के समाधान मे सक्षम हो अर्थात् जानकार हो । किसी भी व्यक्ति को केवल उम्र मे सबसे बड़ा होने के आधार पर , असफलता के लिए जिम्‍मेदार नही ठहराया जा सकता । आज समाज के मार्गदशन की जिम्‍मेदारी बुद्विजीवी लोगों की है , ना की बुजुर्ग ल...

समाज का राजनैतिक प्रतिनिधित्व कैसे बढे.

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संजेश गोलिया         राजनीति अर्थात् ऐसी नीति जो हमे राजा बना दे । भारत देश की शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक है । जिसे नेता चलाते है , जिसके लिये किसी शैक्षिक योग्यता की जरूरत नही हैं । जबकि सरकार की नोकरी पाने के लिए योग्यता चाहिये । आज समाज कोई भी हो , समाज के प्रत्येक नागरिक की इच्छा होती है कि हमारे समाज के ज्यादा से ज्यादा सांसद , विधायक , प्रधान , सरपंच व पार्षद हो ।        अब प्रश्न उठता है कि यह कैसे सम्भव हो ? इच्छा तो सभी करते हैं , लेकिन इसके लिए कोई ठोस प्रयास नही करता । तो फिर क्या करे , हमे इसके लिये प्रत्येक ग्राम , तहसील , जिला स्तर पर लोगों मे राजनीतिक चेतना का अलख जगाना होगा और उन्हें समझना होगा कि , पिछले 66 वर्षों से हम वोट देते आ रहे हैं । हमे क्या मिला और क्या हमे मिलना चाहिये था । जबकि वोट तो वह ताकत है जो एक साधारण आदमी को राजा बना देता है ओर राजा को साधारण आदमी ! आजादी से पूर्व राजा मॉ के पेट से पैदा होता था , लेकिन आज इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन से पैदा होता है । हमे इसे गम्भीरता से समझना होगा ।    ...

महिला शोषण - निजात कौन दिलाएगा

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सुनील कुमार बामने   समाज में महिलाएँ माँ शक्ति का जीवित रूप है । सदियों से महिला पुरुष से घर , परिवार और समाज में संयम , सहनशीलता , संवेदना , सूझबूझ और मानवीय गुणों में अग्रणी रही है । इतिहास सैकड़ों नारियों के बलिदान की गाथाओँ से भरा पड़ा है । नर पर नारी भारी है । अतः उसने अपना दायरा बढ़ाया , घर-परिवार के साथ-साथ समाज , शिक्षा , ज्ञान-विज्ञान , कला , संस्कृति , धर्म , अर्थ और राजनीति में महिलाओँ की संख्या बढ़ी है । यह आधी आबादी के मान-सम्मान और कुशलता के विकास का शुभ संकेत है । वर्तमान में महिलाएँ पंचायतों , नगर-परिषदों , विधानसभाओं , और संसद में अपनी क्षमताओँ से अच्छा कार्य कर रही है । किंतु आज भी विडम्बनाएँ हमें ठेंगा दिखाती है , गाँवों-शहरों में प्रति चौवन मिनट में एक महिला का बलात्कार होता है । नगरों , महानगरों , देश की राजधानी में महिलाओँ से छेड़खानी , देह शोषण के किस्से आम बात है । कमोबेश समाज में महिला शोषण की पूरी कड़ी है । अंधविश्वासी और गरीब लालन- पालन के डर , धनवान पुत्र की चाह में लिंग परीक्षण करवाकर महिला शोषण की नींव रखते है । बच्चियों को घरेलू काम के लिए अशिक्षित र...

दहेज प्रथा एक अभिशाप

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  सुनील कुमार बामने        दहेज का अर्थ है जो सम्पत्ति , विवाह के समय वधू के परिवार की तरफ़ से वर को दी जाती है । दहेज को उर्दू में जहेज़ कहते हैं । यूरोप , भारत , अफ्रीका और दुनिया के अन्य भागों में दहेज प्रथा का लंबा इतिहास है । भारत में इसे दहेज , हुँडा या वर-दक्षिणा के नाम से भी जाना जाता है तथा वधू के परिवार द्वारा नक़द या वस्तुओं के रूप में यह वर के परिवार को वधू के साथ दिया जाता है । प्राचीन समय से ही भारतीय समाज में कई प्रकार की प्रथाएं विद्यमान रही हैं जिनमें से अधिकांश परंपराओं का सूत्रपात किसी अच्छे उद्देश्य से किया गया था । इसे शुरू करने के पीछे बहुत अछा मकसद था यह परम्परा सिर्फ हिंदू परम्परा नहीं थी । यह परम्परा बहुत सारे संस्कृतियों में होता था । पहले हमारे समाज में बेटियों को हर जरूरत की चीजें और कुछ पैसे देते थे जिससे वह आर्थिक रूप से कमजोर न रहे व अपने ससुराल में कुछ तकलीफ न हो । लेकिन समय बीतने के साथ-साथ इन प्रथाओं की उपयोगिता पर भी प्रश्नचिंह लगता गया जिसके परिणामस्वरूप पारिवारिक और सामाजिक तौर पर ऐसी अनेक मान्यताएं आज अपना औचित्य पूरी ...