सामाजिक संगठनों पर नौकरशाहो का कब्जा
सुनील कुमार बामने आज देश के दलित-आदिवासी संगठनो पर नजर डाले तो , आज देखेगें की इन संगठनों का महत्व नही के बराबर है। वे कौनसे कारण है कि यह संगठन ना तो , समाज को संगठित करने में सफल हुए , ना ही इनके अधिकारों की सुरक्षा देने में। आप इन संगठनो पर नजर डाले तो एक बात बहुत स्पष्ट नजर आती है कि इन सभी संगठनो की लीडरशिप पर ब्योरोक्रेट/नौकरशाहों का कब्जा हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि ये लोग इन संस्थाओं पर कब्जा भी तब करने आते है , जब सरकार इन्हें घर भेज देती है अर्थात् रिटायर्ड कर देती हैं। मेरी समझ में यह नही आता है कि आखिर यह लोग उम्र के अन्तिम पड़ाव में ही इन संस्थाओं का नेतृत्व करने क्यों आ जाते है , जबकि यह बहुत अच्छी तरह जानते है कि उम्र के अन्तिम पड़ाव में , यह समाज को नेतृत्व नही दे सकते , ना ही उम्र व परिस्थितियाॅ इसकी अनुमति देती है क्योकि जिसे सरकार ने रिटायर्ड कर , घर भेज दिया हो। जो सरकारे , दुनिया के बड़े-बड़े राजतंत्र को चलाती हो , उन्हें नही लगता है कि उम्र के अन्तिम पड़ाव में , इ...